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Chandragupta II चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-412 ई.)

Chandragupta II चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-412 ई.)

Chandragupta II चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी कन्या प्रभावती का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय से कराया जो ब्राह्मण जाति का था तथा मध्य भारत में शासन करता था।

वाकाटक राज्य पर अप्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभाव स्थापित कर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिमी मालवा और गुजरात पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया तथा वहाँ के 400 साल पुराने शक क्षत्रपों के शासन का अंत किया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन को द्वितीय राजधानी बनाया। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यह उपाधि इससे पूर्व 57 ई. पू. में उज्जैन के शासक ने पश्चिमी भारत में शक क्षत्रपों पर विजय पाने के उपलक्ष्य में धारण की थी ।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने दो रजत मुद्राओं (Silver Coins) का सर्वप्रथम प्रचलन करवाया था। चन्द्रगुप्त के सिक्के पर देवश्री लिखा हुआ है। मेहरौली से प्राप्त एक लौह स्तम्भ में चन्द्र नामक शासक की पहचान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य से की जाती है। चन्द्रगुप्त द्वितीय का उज्जैन स्थित दरबार कालिदास और अमरसिंह जैसे बड़े-बड़े विद्वानों से विभूषित था।

चन्द्रगुप्त के समय में चीनी यात्री फाह्यान (399-414 ई.) भारत आया। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम गुप्त साम्राज्य का शासक बना।

Chandragupta II कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्या) (415-455 ई.)

उसकी मुद्राओं पर श्रीमहेन्द्र महेन्द्रादित्य, आदि उपाधियाँ अंकित थीं। उसके स्वर्ण सिक्कों पर उसे गुप्तकुलामल चन्द्र एवं गुप्तकुल व्योमशशि कहा गया है। शक्रादित्य को कुमारगुप्त की उपाधि महेन्द्रादित्य के समानार्थी माना गया है। कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया और अश्वमेध प्रकार की मुद्रा चलाई। कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी।

विश्वविद्यालय में समय की माप के लिए जल घड़ी का प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक छात्र एवं छात्राओं के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षा से गुजरना पड़ता था। कुमारगुप्त के समय में सर्वाधिक गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनकी संख्या लगभग 18 है। इसके समय में गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं का सबसे बड़ा ढेर बयाना मुद्राभंडार (राजस्थान के भरतपुर जिले में) से प्राप्त हुआ है, जिसमें 623 मुद्राएँ मिली हैं।

इनमें मयूर शैली की मुद्राएँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। इस शैली में चाँदी की कुछ मुद्राएँ सबसे पहले मध्यप्रदेश में प्राप्त हुई। कुमारगुप्त प्रथम के अन्तिम दिनों में पुष्यमित्र नामक जातियों ने आक्रमण किया। इसका उल्लेख स्कन्दगुप्त के भीतरी अभिलेख में मिलता है। कुमारगुप्त ने इन्हें पराजित करने के लिए अपने योग्य पुत्र स्कन्दगुप्त को भेजा। स्कन्दगुप्त पुष्यमित्रों को पराजित करने में सफल हुआ।

Vishal Singh

Vishal Singh

Teacher
“Hi, I am Vishal Singh. I completed my Graduations in Physics in 2020 at VKSU, Arrah. Now I'm Preparing For Civil Service Exams. I'm Interested Physics as well as History, Polity, Geography, Technology & Science.

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